
27 April 2026 · Temple Admin
Kesariyaji Puja Vidhi: The Special Digambar Jain Puja of Rishabhdev Tirth
A complete guide to the daily puja, Panchkalyanak Arghya, Jayamala, and Aarti performed at Shri 1008 Rishabhdev Kesariyaji Atishaya Kshetra. What makes the puja here extraordinary is that it follows the Digambar Jain Panch Kalyanank tradition.
भगवान श्री ऋषभदेव पूजा
(नोट :- प्रतिदिन अतिशय क्षेत्र के मूलनायक भ. आदिनाथ स्वामी की पूजा करें )
स्थापना
भारत के अतिशय क्षेत्रों में, ऋषभदेव का तीर्थ प्रधान ।
बावन जिन मंदिर से शोभित, केशरिया जिनवर भगवान ।।
करें अर्चना भक्ति-भाव से, आह्वान करते जिनराज ।
तिष्ठ हूं तिष्ठ हूं सन्निधिस्वामी, पूजें आत्म-सिद्धि के काज ।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव तीर्थ नायक आदिनाथ जिनेन्द्र अत्र अवतर-अवतर
संवोषट् आह्वाननं।
अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरणं।
(अडिल्ल छन्द)
निर्मल जल परिपूर्ण कलश कर में लिया।
जन्म-मरण दू:ख नाशन जल अर्पण किया ।।
ऋषभदेव-केशरिया जिन अर्चन करूं।
भक्ति सहित पूजन कर भव-सागर तरूं।।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय नम: जन्म-जरा-मृत्यु विनाशाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा ।
गंध सुगंधित अष्ट गंध लायके ।
ताप-शमन के हेतु जंजुं शिर नायके।।
ऋषभदेव-केशरिया जिन अर्चन करूं।
भक्ति सहित पूजन कर भव-सागर तरूं।।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय नम: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
मुक्ता सम तन्दुल यह धवल अखण्ड है।
जजत जी पावत अक्षय परमानन्द है।।
ऋषभदेव-केशरिया जिन अर्चन करूं।
भक्ति सहित पूजन कर भव-सागर तरूं।।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय नम: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
विविध वर्ण के कुसुम-सुमन सुरभित सजे।
अर्पण से सब काम-रति-सेना भजे।।
ऋषभदेव-केशरिया जिन अर्चन करूं।
भक्ति सहित पूजन कर भव-सागर तरूं।।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय नम: कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
छट्रस व्यंजन मधुर-मधुर थाली भरें।
जिन चरणाम्बुज अर्पत क्षुधा-व्याधि हरें।।
ऋषभदेव-केशरिया जिन अर्चन करूं।
भक्ति सहित पूजन कर भव-सागर तरूं।।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय नम: क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जगमग-जगमग ज्योतिर्मय यह आरती।
मानस-मंदिर जगी ज्ञान की आरती।।
ऋषभदेव-केशरिया जिन अर्चन करूं।
भक्ति सहित पूजन कर भव-सागर तरूं।।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय नम: मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सौरभमय दशगंध धूप अग्नि-जले।
अष्ट कर्म विध्वंस सकल अघ दल मले।।
ऋषभदेव-केशरिया जिन अर्चन करूं।
भक्ति सहित पूजन कर भव-सागर तरूं।।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय नम: अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
श्रीफल आदि विविध फल थाली में भरें।
अर्पत ही हम मोक्ष महालक्ष्मी वरें।।
ऋषभदेव-केशरिया जिन अर्चन करूं।
भक्ति सहित पूजन कर भव-सागर तरूं।।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय नम: मोक्ष-फल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
नीरादिक वसु द्रव्य लाय मन मोहना।
अर्घ्य समर्पण पावत शिव-सुख सोहना।।
ऋषभदेव-केशरिया जिन अर्चन करूं।
भक्ति सहित पूजन कर भव-सागर तरूं।।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय नम: अनर्घ्यपद प्राप्ताय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचकल्याणक अर्घ्य (छन्द चाल)
सवार्थ सिद्धिते आये, मरूदेवी मां उर छाये ।
दुज आषाढ़ असित तिथि आई , हम पूंजे श्री जिनराज ।।
ॐ ह्रीं आषाढ़ कृष्णा द्वितीयां गर्भ कल्याणक प्राप्ताय श्री ऋषभ जिनेन्द्राय,
नम: अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।1।।
जनमे त्रिभुवन सुखदाता, चैतर विद नवम प्रभाता ।
अछ्भुत सुवर्ण तन शोभा, लखि सुर सुरपति मन -लोभा ।
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णा नवम्यां जन्म कल्याणक प्राप्ताय श्री ऋषभ जिनेन्द्राय,
नम: अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।2।।
चैतर विद नवमी आई, तप धारयो श्री जिनराई।
निर्ग्रथ महामुनि देवा, हम पूजे नित करि सेवा ।।
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णा नवम्यां तपोमंगल मंडिताय प्राप्ताय श्री ऋषभ जिनेन्द्राय,
नम: अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।3।।
फाल्गुन विद् ग्यारस आई, प्रभु केवल ज्ञान उपाई ।
तब प्रभु उपदेश जु कीना, भवि जन को सुख दीना ।।
ॐ ह्रीं फाल्गुन कृष्णा एकादश्यां तपोमंगल ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय श्री ऋषभ
जिनेन्द्राय नम: अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।4।।
विद माघ चतुर्दशी आई, कैलाश शिखर सुखदाई।
निर्वाण-मोक्ष प्रभु पाया, भवि जन को सुख दीना ।।
ॐ ह्रीं माघ कृष्णा चतुर्दश्यां मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय श्री ऋषभ जिनेन्द्राय,
नम: अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।।5।।
जयमाला
-: छन्द त्रिभंगी :-
शुभ नयरि धूलेवा जहाँ जिन देवा, आदि जिनेश्वर ध्यान धरो।
'मार्तण्ड' मनोहर मंगल गाकर, भरि-भरि थाल सुपूज करो।।
-: पद्धरी छन्द :-
जय केशरिया जय ऋषभदेव, सुर नर जिनकी करते सुसेव।
जो प्रथम तीर्थंकर है महेश, गावहिं गुण गनि नायक सुरेश।।
जिनकी महिमा बरणत न पार, मुनि जन-मन के हैं जो उजार।
तिनके चरणाम्बुज हरहिपीर, मिट जाय हमारी सकल भीर ।।
तुम नयरि अध्योध्या जन्म लीन्ह, निर्वाण-मोक्ष-पथ प्रकट कीन्ह।
तुम परम ब्रह्मा शंकर सुरेश, हो परम बुद्ध जगपति जिनेश।।
तुम अतिशय तें यह पुर धुलेव, विख्यात भया यह 'ऋषभदेव'।
आवत दर्शन को जन अनेक, पूजहिं पद केशर से विवेक ।।
है भव्य जिनालय अति विशाल, बावन जिन गृह शोभहिं सुभाल।
जन-भावन तीर्थ बना महान, इतिहास कला संस्कृति निधान ।।
जय-जय जगपति जय तीर्थनाथ, वंदउं प्रभु पद नित जोरि हाथ।
भव-भंजन मन-रंजन सुरेश, पूजहिं नित जय-जय जय जिनेश ।।
-: धत्ता :-
जय भव -भय भंजन, मुनि-मन रंजन,
गनि-मन-मनि अरिहंत प्रभो।
निर्वाण-प्रकाशक धर्म-विधायक,
धर्म-धुरंधर विश्व-विभो।।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव-केशरिया जिनेन्द्राय नम: जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
आरती श्री ऋषभदेवजी
जय-जय आरती आदि जिणन्दा
नाभिराजा मरू देवी के नन्दा ।।जय-जय ।।
पहली आरती पूजा कीजै
नर भव पामीने ल्हावों लीजे ।।1 ।।जय-जय ।।
दुसरी आरती दीन दयाला
धूलेवा मण्डप मा जग अजुवाला ।।2 ।।जय जय ।।
तीसरी आरती त्रिभुवन देवा
सुर-नर इन्द्र करे तौरी सेवा ।।3 ।।जय जय ।।
चौथी आरती चहुंगति चुरे
मन वांछित फल शिव सुख पुरे ।।4 ।।जय जय ।।
पंचमी आरती पुण्य उपायो
मुलचन्द ऋषभ गुण गायो ।।5 ।।जय जय ।।